कृषि की बढ़ रही लागत, मिट्टी की कम होती उर्वरता और पर्यावरण को पहुँच रहे नुकसान की चुनौतियों के बीच जबलपुर जिले के विकासखंड पनागर अंतर्गत ग्राम मोहलझिर के प्रगतिशील कृषक सुरेंद्र कुमार पटेल ने प्राकृतिक खेती अपनाकर एक प्रेरणादायक पहल की है। पिछले लगभग 2 वर्षों से निरंतर रसायन-मुक्त प्राकृतिक कृषि कर वे न केवल खेती की लागत को नियंत्रित करने में सफल हुए हैं, बल्कि अपनी कृषि भूमि की सेहत सुधारकर अन्य कृषकों के लिए भी आत्मनिर्भरता का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
सुरेंद्र कुमार पटेल ने अपने खेतों में रासायनिक उर्वरकों एवं जहरीले कीटनाशकों का प्रयोग पूरी तरह बंद कर दिया है। इसके स्थान पर वे स्थानीय स्तर पर सुलभ प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर स्वयं कृषि आदान तैयार कर रहे हैं।
श्री पटेल देशी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, दाल अथवा बेसन और स्थानीय जैविक तत्वों के मिश्रण से जीवामृत तैयार कर फसलों में उपयोग करते हैं। वहीं, रासायनिक दवाओं के विकल्प के रूप में नीम तथा स्थानीय वनस्पतियों के अर्क से ब्रह्मास्त्र व अन्य प्राकृतिक घोल बनाकर कीटों का प्रभावी प्रबंधन भी करते हैं।
बाजार से महंगे रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक न खरीदने के कारण खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आई है। खेत पर ही आदान तैयार होने से मिट्टी में जैविक गतिविधियों को बढ़ावा मिला है, केंचुओं और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ी है तथा भूमि की गुणवत्ता व जल-धारण क्षमता मजबूत हुई है।
उनका का यह कदम रासायनिक खाद-मुक्त टिकाऊ कृषि की दिशा में एक सकारात्मक मॉडल बनकर उभरा है, जिससे क्षेत्र के अन्य किसान भी प्रेरित होकर प्राकृतिक खेती को अपना रहे हैं।
सुरेन्द्र पटेल कहते हैं कि यदि किसान स्थानीय संसाधनों का समुचित उपयोग करते हुए प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाएं, तो खेती को कम खर्च में अधिक टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
