कैसे हुई शुरुआत? थाणे की गलियों से शुरू हुई कहानी आज एशियन गेम्स के मंच तक पहुंच चुकी है।
16 दिसंबर 2003 को महाराष्ट्र के ठाणे में जन्मे रुद्रांक्ष पाटिल ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि जिस खेल को उन्होंने बाद में अपनाया, वही एक दिन उनकी पहचान बन जाएगा।
लेकिन किस्मत ने उन्हें एक अलग खेल के लिए चुना था।
परिवार के प्रोत्साहन ने रुद्रांक्ष को शूटिंग की ओर बढ़ाया और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
पिता बालासाहेब पाटिल और मां हेमांगिनी पाटिल के समर्थन से उन्होंने निशानेबाजी को अपना लक्ष्य बनाया।
कम उम्र में ही रुद्रांक्ष ने यह दिखा दिया कि उनके निशाने में सिर्फ सटीकता नहीं, बल्कि बड़े सपने भी हैं।
जब दुनिया ने पहचाना भारत का नया विश्व चैंपियन साल 2022 रुद्रांक्ष के करियर का सबसे खास पड़ाव बनकर आया।
काहिरा में आयोजित विश्व चैंपियनशिप में उन्होंने पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया।
महज 18 साल की उम्र में विश्व चैंपियन बनना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी।
इससे भी बड़ी बात यह थी कि रुद्रांक्ष भारत के लिए 10 मीटर एयर राइफल में विश्व चैंपियन बनने वाले अभिनव बिंद्रा के बाद दूसरे भारतीय बने।
यह वह पल था जब एक युवा निशानेबाज का नाम अचानक दुनिया के बड़े मंच पर गूंजने लगा।
विश्व चैंपियन बनने के साथ ही रुद्रांक्ष ने पेरिस ओलंपिक का कोटा भी हासिल किया।
जिस उम्र में कई खिलाड़ी अपने करियर की दिशा तय कर रहे होते हैं, उस उम्र में रुद्रांक्ष ने दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच की ओर अपना रास्ता बना लिया था।
एशियन गेम्स में भी दिखा दम रुद्रांक्ष का सफर सिर्फ विश्व चैंपियनशिप तक सीमित नहीं रहा।
एशियन गेम्स में भी उन्होंने भारत को गौरवान्वित किया।
टीम स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए उन्होंने पदक अपने नाम किए और यह साबित किया कि बड़े मुकाबलों का दबाव उन्हें पीछे हटाने वाला नहीं है।
2026 के एशियन गेम्स में भी रुद्रांक्ष ने अपने अभियान की शुरुआत पदक के साथ की।
पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल टीम स्पर्धा में उन्होंने हिमांशु ढिल्लन और पार्थ माने के साथ मिलकर भारत को रजत पदक दिलाया।
स्वर्ण की ओर बढ़े, एक शॉट ने बदल दी तस्वीर व्यक्तिगत स्पर्धा के फाइनल में रुद्रांक्ष लंबे समय तक स्वर्ण पदक की दौड़ में सबसे आगे रहे।
उनके निशाने लगातार उन्हें पोडियम के शीर्ष पायदान की ओर ले जा रहे थे।
फिर मुकाबले का वह दौर आया, जब एक छोटी-सी चूक ने पूरी तस्वीर बदल दी।
चीन के शेन लिहाओ ने शानदार वापसी की और रुद्रांक्ष पर दबाव बढ़ता गया।
वह स्वर्ण की स्थिति से नीचे आए और देखते ही देखते तीसरे स्थान पर पहुंच गए।
एक समय जो निशानेबाज सोने की ओर बढ़ रहा था, उसे अब कांस्य बचाने के लिए निशाना साधना था।
वापसी की कोशिश की, लेकिन इस बार स्वर्ण नहीं मिला।
उन्होंने 230.9 अंक के साथ कांस्य पदक हासिल किया।
हिमांशु ढिल्लन ने 252.4 अंक के साथ रजत जीता, जबकि चीन के शेन लिहाओ ने 254.2 अंक के साथ एशियन गेम्स रिकॉर्ड बनाते हुए स्वर्ण अपने नाम किया।
सोना नहीं मिला, लेकिन कहानी यादगार हुई किसी खिलाड़ी के लिए शायद यह सोच पाना आसान नहीं होता कि जब स्वर्ण पदक इतना करीब आकर हाथ से निकल जाए तो खुद को कैसे संभाला जाए।
लेकिन रुद्रांक्ष की कहानी सिर्फ उस एक 9.7 के शॉट की कहानी नहीं है।
यह उस लड़के की कहानी है जिसने शतरंज और फुटबॉल से शुरुआत की, फिर शूटिंग को चुना और देखते ही देखते दुनिया का चैंपियन बन गया।
यह उस परिवार की कहानी है जिसने बेटे के सपने पर भरोसा किया।
यह उस युवा खिलाड़ी की कहानी है जिसने कम उम्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं और फिर भी हर नए मुकाबले में खुद को दोबारा साबित करने के लिए लाइन पर खड़ा हुआ।
और शायद यही वजह है कि एशियन गेम्स का यह कांस्य पदक रुद्रांक्ष के सफर में सिर्फ एक और पदक नहीं है।
यह याद दिलाता है कि खेल में हर कहानी स्वर्ण पदक पर खत्म नहीं होती।
कभी-कभी कांस्य भी उस संघर्ष की गवाही देता है, जिसमें खिलाड़ी आखिरी शॉट तक हार नहीं मानता।
मुख्य बातें
- कैसे हुई शुरुआत? थाणे की गलियों से शुरू हुई कहानी आज एशियन गेम्स के मंच तक पहुंच चुकी है।
- 16 दिसंबर 2003 को महाराष्ट्र के ठाणे में जन्मे रुद्रांक्ष पाटिल ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि जिस खेल को उन्होंने बाद में अपनाया, वही एक …
- लेकिन किस्मत ने उन्हें एक अलग खेल के लिए चुना था।
स्रोत और संदर्भ
- अमर उजाला · रुद्रांक्ष पाटिल की कहानी: शतरंज-फुटबॉल से शुरू हुआ सफर, विश्व चैंपियन बनने के बाद एशियन गेम्स में जीता कांस्य ↗21 सितंबर 2026
सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 21 सितंबर 2026।



