परिवार ने सपने के लिए लगाई जमा-पूंजी शूटिंग महंगा खेल है।
इसके लिए राइफल, उपकरण और विशेषज्ञ ट्रेनिंग की जरूरत होती है।
हिमांशु के परिवार ने उनके सपने को पूरा करने के लिए अपनी जमा-पूंजी तक लगा दी।
जींद की स्थानीय शूटिंग रेंज से शुरुआत करने वाले हिमांशु ने घंटों अभ्यास किया।
निशानेबाजी में एकाग्रता और नियंत्रण बेहद अहम होता है, इसलिए उन्होंने ध्यान और अनुशासन को भी अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाया।
उन्होंने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीते और जूनियर भारतीय शूटिंग टीम में जगह बनाई।
ट्रेनिंग के साथ उन्होंने लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी से बीएससी की पढ़ाई भी की।
2026 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली बड़ी पहचान साल 2026 की शुरुआत में चीन के हांगझोउ में हुए आईएसएसएफ वर्ल्ड कप में हिमांशु ने सोनम मस्कर के साथ मिलकर मिक्स्ड टीम स्पर्धा में ब्रॉन्ज मेडल जीता।
इस प्रदर्शन ने उन्हें सीनियर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत करने का मौका दिया।
इसके बाद एशियन गेम्स 2026 में उन्होंने अपने प्रदर्शन को एक और ऊंचाई दी।
एशियन गेम्स में दो सिल्वर, एक व्यक्तिगत पदक आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 में हिमांशु ने पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल व्यक्तिगत स्पर्धा में सिल्वर मेडल जीता।
इस स्पर्धा में चीन के शेन लिहाओ ने एशियन गेम्स रिकॉर्ड के साथ गोल्ड मेडल जीता, जबकि भारत के रुद्रांक्ष पाटिल ने कांस्य पदक अपने नाम किया।
हिमांशु की सफलता व्यक्तिगत स्पर्धा तक सीमित नहीं रही।
उन्होंने रुद्रांक्ष पाटिल और पार्थ माने के साथ पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल टीम स्पर्धा में भी भारत को सिल्वर मेडल दिलाया।
यानी एशियन गेम्स 2026 में हिमांशु के खाते में अब तक दो सिल्वर मेडल हैं।
चाचा ने सिखाया 'चैंपियन माइंडसेट' हरदीप सिंह ढिल्लन ने हिमांशु को शूटिंग की तकनीकी ट्रेनिंग नहीं दी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय खेल के दबाव से निपटने की मानसिक तैयारी जरूर कराई।
उन्होंने हिमांशु को दबाव में शांत रहने और हार से सीखने की आदत डाली।
हरदीप सिंह की सीख थी, 'जब तुम पोडियम पर होते हो, तो दबाव सिर्फ तुम्हारे ऊपर नहीं, तुम्हारे विरोधी पर भी होता है।
जो उस पल में शांत रह गया, वही सिकंदर है।' उन्होंने हिमांशु को 'नो एक्सक्यूज' वाला अनुशासन भी सिखाया।
मौसम या किसी दूसरी परेशानी को ट्रेनिंग छोड़ने का बहाना न बनाने और हार के बाद चूके हुए शॉट्स का विश्लेषण करने की सीख ने हिमांशु के खेल को परिपक्व बनाने में भूमिका निभाई।
जींद से शुरू हुआ हिमांशु का सफर अब एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंच चुका है।
एक ओर व्यक्तिगत स्पर्धा का सिल्वर, दूसरी ओर टीम इवेंट का सिल्वर, हिमांशु ने निशानेबाजी में अपने नाम की मजबूत पहचान बना ली है।
मुख्य बातें
- परिवार ने सपने के लिए लगाई जमा-पूंजी शूटिंग महंगा खेल है।
- इसके लिए राइफल, उपकरण और विशेषज्ञ ट्रेनिंग की जरूरत होती है।
- हिमांशु के परिवार ने उनके सपने को पूरा करने के लिए अपनी जमा-पूंजी तक लगा दी।
स्रोत और संदर्भ
- अमर उजाला · एशियन गेम्स 2026: हिमांशु की राइफल ने दिलाया रजत; चाचा अखाड़े के चैंपियन, फिर भतीजे ने क्यों चुनी निशानेबाजी? ↗21 सितंबर 2026
सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 21 सितंबर 2026।



